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समाजवादी पार्टी में दंगल : रिश्ते की गर्माहट बाप-बेटे की जिद पर पड़ी भारी, लेकिन जिद तो जिद है.

समाजवादी पार्टी में दंगल : रिश्ते की गर्माहट बाप-बेटे की जिद पर पड़ी भारी, लेकिन जिद तो जिद है.

2017-01-10 06:31:18
समाजवादी पार्टी में दंगल : रिश्ते की गर्माहट बाप-बेटे की जिद पर पड़ी भारी, लेकिन जिद तो जिद है.

नई दिल्ली-- उत्तर प्रदेश की राजनीति में समाजवादी पार्टी की भीतरी राजनीति कुछ इस कदर भारी है कि अब राज्य से किसी और पार्टी या उससे जुड़े नेताओं की खबर सुर्खियों में पहुंचने से कोसों दूर रह जाती है.

इतने लंबे विवाद के बाद भी पार्टी के सर्वेसर्वा रहे मुलायम सिंह यादव के व्यवहार से साफ दिखाई दे रहा है कि वह अपने बेटे के खिलाफ कोई कदम नहीं उठाना चाहते हैं, वहीं बेटे की ओर से भी साफ दिखाई दे रहा है कि वह अपने पिता के प्रति पूरा सम्मान रखते हैं. रिश्तों की गर्माहट इतने बड़े राजनीतिक विवाद के बाद भी बरकरार है, यह इस पूरे घटनाक्रम का एक सुखद पहलू है.

मुलायम सिंह यादव भले ही चुनाव आयोग तक लड़ाई को लाए हैं और पार्टी और चुनाव चिह्न पर कब्जे के लिए लड़ाई लड़ रहे हैं लेकिन, सोमवार को उन्होंने कहा कि यूपी विधानसभा चुनाव के बाद अखिलेश यादव ही पार्टी की ओर से राज्य के अगले मुख्यमंत्री होंगे. साथ ही उन्होंने दावा किया कि पार्टी टूटने का सवाल ही नहीं है. मुलायम सिंह यादव ने कहा कि यूपी में जल्द ही वह पार्टी के लिए चुनावी अभियान की शुरुआत करेंगे.

सार्वजनिक तौर पर इस प्रकार की राजनीतिक बात तो दोनों खेमे कर रहे हैं. लेकिन भीतरी बातें दोनों खेमों के नजदीकी लोग मीडिया तक पहुंचा रहे हैं.

यह तो स्पष्ट है कि बाप (मुलायम सिंह यादव) और बेटा (अखिलेश यादव) में संबंध सार्वजनिक तौर पर भले ही कड़वे दिख रहे हों, लेकिन दोनों में एक दूसरे के प्रति लगाव साफ दिखाई दे रहा है. नजदीकी लोगों का कहना है कि दोनों ओर से बाप-बेटे के करीबी लोग लड़ाई लगवा रहे हैं.

जहां मुलायम सिंह यादव करीबी अखिलेश यादव के साथ खड़े रामगोपाल यादव को दोषी बता रहे हैं वहीं दूसरा खेमा शिवपाल यादव और अमर सिंह को पूरे विवाद की जड़ बता रहा है.

मुलायम सिंह यादव की ओर से साफ है कि वह अध्यक्ष पद से नहीं हटेंगे. उनकी पूरी लड़ाई सिर्फ एक पद के लिए है. उनका साफ कहना है कि अगर पार्टी अध्यक्ष पद छीन लिया गया तो सब कुछ चला गया, फिर बचा तो क्या बचा. ऐसे में तो कोई समझौता नहीं हुआ, यह तो एक प्रकार से पूरी तरह का सरेंडर है. पार्टी हमने बनाई, हमने काम किया, लोगों को जोड़ा और पार्टी से जैसे बेदखल हो गए.

जब से विवाद हुआ है तब से अब तक के प्रकरण पर नजर डाले तो मुलायम सिंह यादव ने भले ही अपने बेटे और प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के खिलाफ एक बार कार्रवाई की हो, लेकिन उसे जल्द ही वापस भी ले लिया.

एक बाद साफ है कि मुलायम सिंह खेमा किसी भी प्रकार के समझौते में डॉ रामगोपाल यादव के साथ नहीं है. वह किसी भी स्थिति में डॉ रामगोपाल यादव को पार्टी से बाहर देखना चाहता है.

उधर, पार्टी के भीतरी लोगों का मानना है कि अब अगर कोई समझौता होगा तो वह सिर्फ डॉ रामगोपाल यादव की मर्जी के बगैर संभव नहीं है. मुलायम सिंह यादव खेमे के लोगों को कहना है कि अखिलेश यादव का डॉ रामगोपाल यादव ने ब्रेनवॉश कर दिया है और अखिलेश यादव उनके बिना एक कदम भी चलने को तैयार नहीं हैं.

मुलायम सिंह यादव खेमे की ओर से पार्टी में सुलह की कोशिशों में साफ कर दिया गया था कि अगर अखिलेश यादव चाहते हैं कि चाचा शिवपाल यादव पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष पद से हट जाएं तो वह तैयार हैं. इतना ही नहीं, अगर अखिलेश यादव यह चाहते हैं कि शिवपाल यादव चुनाव नहीं लड़ें तो वह इसके लिए भी तैयार हैं. इसके अलावा बात जसवंतनगर सीट की थी तो शिवपाल यादव की ओर से साफ कर दिया गया था कि वह इस सीट को भी छोड़ देंगे.

अखिलेश यादव की दूसरी सबसे बड़ी अड़चन पार्टी महासचिव अमर सिंह रहे हैं. मुलायम के करीबी लोगों का कहना है कि पार्टी और मुलायम सिंह यादव के लिए अमर सिंह पार्टी से हटने के लिए पहले ही तैयार थे और यहां तक राज्यसभा से इस्तीफा भी देने को तैयार हैं.

शिवपाल यादव और अमर सिंह यादव के पार्टी और मुलायम सिंह यादव के लिए इतनी तैयारी के बाद भी मुलायम सिंह यादव ने दोनों को ऐसा करने से रोका हुआ था और है भी... मुलायम सिंह यादव खेमे का आरोप है कि इस पूरे प्रकरण में अगर कोई विलेन है तो वह डॉ रामगोपाल यादव हैं.

इनका कहना है कि शिवपाल यादव और डॉ रामगोपाल यादव की लड़ाई बहुत पुरानी है. यह लड़ाई करीब 35 साल पुरानी है. बात एक स्कूल की है और तब की है जब दोनों ही राजनीति में नहीं थे. एक स्कूल के प्रिंसिपल के बिल मैनेजिंग कमेटी में रहे शिवपाल यादव ने पास नहीं किए थे. कहा जाता है कि बिलों में कुछ गड़बड़ी थी और वह प्रिंसिपल डॉ रामगोपाल यादव का करीबी था. डॉ रामगोपाल यादव के कहने के बाद भी शिवपाल ने ऐसा नहीं किया था.

इतन ही नहीं मुलायम सिंह यादव के खेमे के लोगों का कहना है कि बिहार में ग्रैंड अलायंस के कर्ताधर्ता भी शिवपाल यादव थे. शिवपाल यादव इस बात के लिए आरजेडी और जनता दल को तैयार कर चुके थे कि मर्जर हो जाए और मुलायम सिंह यादव नई पार्टी के अध्यक्ष बने. कहा जाता है कि शिवपाल यादव के नीतीश कुमार, लालू प्रसाद यादव और शरद यादव से करीबी रिश्ते हैं.

मुलायम खेमे का कहना है कि डॉ रामगोपाल यादव का बेटा सीबीआई जांच में फंसा है. इतना ही नहीं, नोएडा के चीफ इंजीनियर यादव सिंह के मामले में डॉ रामगोपाल यादव के बेटे की कंपनी भी जांच के दायरे में आई है. इस खेमे का आरोप है कि डॉ रामगोपाल यादव ने बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह से डील करके ग्रैंड अलायंस तुड़वाया. कारण यह बताया जा रहा है कि अगर यह अलायंस राजनीति में फलीभूत होता तो शिवपाल यादव का कद काफी बढ़ जाता.

इस खेमे का कहना है कि इससे राज्यसभा में डॉ रामगोपाल का पद चला जाता और देवेगौड़ा जो काफी वरिष्ठ नेता है उन्हें उनका पद दिया जाता.

इस खेमे का आरोप है कि डॉ रामगोपाल यादव ने अखिलेश यादव को यहां पर भड़काया, उन्होंने कहा कि अगर शिवपाल यादव का कद इतना बढ़ जाएगा तो वह अपना प्रोमोशन करके सीएम पद के उम्मीदवार भी हो सकते हैं. इससे अखिलेश यादव की गद्दी खतरे में आ जाएगी.

मुलायम सिंह यादव के धड़े का कहना है कि आरएलडी से अलायंस तुड़वाया डॉ रामगोपाल ने तुड़वाया. कौमी एकता दल से अलायंस के खिलाफ भी डॉ रामगोपाल यादव थे, उन्होंने ही अखिलेश यादव के कान भरे.

डॉ रामगोपाल चार बार से सांसद हैं. मुलायम सिंह यादव अपना भाई होने के नाते हुए राज्यसभा में पार्टी की ओर से भेजते रहे हैं. मुलायम सिंह यादव की नजर में डॉ रामगोपाल यादव काफी सुलझे और पढ़े लिखे आदमी है. यही वजह रही है कि वह उन्हें पार्टी की नुमाइंदगी के लिए राज्यसभा में भेजते रहे हैं. उधर, शिवपाल यादव जमीनी आदमी हैं, पार्टी का कार्यकर्ता उनके करीब महसूस करता रहा है. यह अलग बात है कि इस समय अधिकतर पार्टी नेता और कार्यकर्ता शिवपाल का साथ छोड़ चुके हैं और अखिलेश यादव और डॉ रामगोपाल के खेमे की ओर आ गए हैं.

पार्टी नेताओं का कहना है कि इस पूरे विवाद की एक बड़ी वजह अखिलेश यादव और मुलायम सिंह यादव के बीच कम्युनीकेशन गैप भी है. दोनों के बीच बातचीत पहले भी नहीं होती थी. इसका भी फायदा दोनों ओर के नेताओं ने अपनी-अपनी बात मनवाने के लिए किया है.

इस बात का प्रमाण और अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब पांच दिन पहले अखिलेश यादव लखनऊ में मुलायम सिंह यादव से मिलने उनके घर गए थे, तब ठीक उसी समय दिल्ली में डॉ रामगोपाल यादव बयान दे रहे थे कि यह मीटिंग बेकार है. कोई सुलह नहीं होगा.

सवाल उठना लाजमी है कि आखिर क्यों इतने बड़े राजनीतिक उथल-पुथल यह पार्टी तख्तापलट के बाद अखिलेश यादव रामगोपाल के साथ हैं?

पार्टी के नेताओं का कहना है कि अखिलेश यादव कुछ इनसिक्यूर (असुरक्षित) हैं. उन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी पर सीधे बिठा दिया गया. कभी किसी छोटे प्रशासनिक पद पर नहीं रहे, कभी किसी विभाग के मंत्री नहीं बने, सीधे सीएम बने, उन्हें यह समझाया गया है कि उन्हें कभी भी डिसलॉज (पद से हटाना) किया जा सकता है. इसके लिए उन्हें यह समझाया गया है कि अगर शिवपाल यादव का कद बढ़ता है और मुलायम सिंह यादव केंद्र की राजनीति में चले गए जैसा की वह अकसर कहते रहते थे, तब शिवपाल उन्हें टेकओवर कर लेंगे. इसके अलावा उन्हें अपने सौतेले भाई प्रतीक यादव का भय भी दिखाया जाता रहा है.

पार्टी के सूत्रों का कहना है कि अखिलेश यादव को मुलायम सिंह यादव खेमे से सारी बाते समझाई गई हैं. उन्हें यह भी साफ कर दिया गया है कि उनकी बात मानी जाएगी. कोई उनकी बात को नहीं काटेगा. बात इतनी ही नहीं है, सूत्रों का कहना है कि खुद आजम खान ने अखिलेश यादव को गारंटी दी है. उन्हें बताया गया कि पार्टी के टिकटों में अखिलेश यादव की ही चलेगी. उनका कोई भी दिया गया टिकट नहीं बदला जाएगा. इसके लिे आजम खान ने यह भी कहा है कि वह खुद इस पूरी लिस्ट पर मुलायम सिंह यादव के दस्तखत करवाकर दे देंगे. लेकिन, अभी तक अखिलेश यादव ने उनकी भी बात नहीं मानी है.

कारण साफ है जिद तो आखिर जिद ही है. मुलायम सिंह यादव अपने भाई डॉ रामगोपाल यादव को पार्टी से बाहर करना चाहते हैं और अखिलेश यादव शिवपाल यादव को बाहर का रास्ता दिखाना चाहते हैं... बात चली जरूर, लेकिन फिर अटक गई...


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