Expressnews7

फ़ाइलेरिया यानि हाथीपांव बीमारी के बारे में जागरूकता- जानिये, बचिए और लोगों को बचाईये

फ़ाइलेरिया यानि हाथीपांव बीमारी के बारे में जागरूकता- जानिये, बचिए और लोगों को बचाईये

2017-12-18 13:25:18
फ़ाइलेरिया यानि हाथीपांव बीमारी के बारे में जागरूकता- जानिये, बचिए और लोगों को बचाईये

फ़ाइलेरिया यानि हाथीपांव बीमारी के बारे में जागरूकता. जानियेए बचिए और लोगों को बचाईये

ज़िन्दगी में बहुत सी बीमारियाँ ऐसी हैं जिनके बारे में जागरूकता ना होने के कारण लोग इन बीमारियों की गिरफ्त में आ जाते है और फिर बहुत मुश्किलों का सामना करना पड़ता है द्य जानकारी और नियमित उपचार से इन बीमारियों से बचा जा सकता है और एक स्वस्थ जीवन शैली हासिल की जा सकती है द्य ऐसी ही एक बीमारी है लिम्फाटिक फिलारियासिस यानी हाथी पांव

लिम्फाटिक फाइलेरियाः
लिम्फाटिक फिलारियासिस एक परजीवीजन्य संक्रामक रोग है जो आम तौर पर हाथीपांव (ऐलीफेन्टाइसिस) के नाम से जाना जाता है। यह रोग धागे जैसे कृमियों की वजह से होता है जिसके तीन प्रकार हैं- वुचेरेरिया बैनक्राॅफ्टी, ब्रुगिया मलयी और ब्रुगिया तिमोरी। इन्हें फाइलेरिया कहते हैं और यह मनुष्यों में मच्छरों से फैलता है जो परजीवी कृमियों के लिए रोगवाहक का काम करते हैं।

संक्रमण के बाद कृमि का लार्वा एक महीन माइक्रोस्कोपिक कृमि में विकसित होता जो रोगी के लिम्फाटिक सिस्टम यानी लसिका प्रणाली में जगह बना लेता है और वहां पहुंच कर व्यस्क कृमि बन जाता है। अपने सात वर्षीय जीवनकाल में ये कृमि लसीका प्रणाली को क्षति पहुंचाते हैं और संक्रमणों की वजह बनते हैं जिससे लसीका द्रव के बहाव में रुकावट व शरीर में सूजन और बुखार जैसी समस्याएं उत्पन्न होती हैं। लिम्फाटिक सिस्टम यानी लसिका प्रणाली हमारे शरीर की रोग प्रतिरोधक प्रणाली का आवश्यक अंग है।

यह संक्रमण आम तौर पर बचपन में होता है लेकिन इसके प्रत्यक्ष लक्षण और फाइलेरिया का संक्रमण होने के कुछ वर्षों बाद इसके लक्षण साफ़ तौर से दिखाई देते हैं इसका असर बाद की जिंदगी में उभरता है, जिसके कारणवश अस्थायी और स्थायी अपंगता हो सकती है।

फाइलेरिया से होने वाले विभिन्न लक्षणों में से प्रमुख हैं- अंगों का लिम्फेडेमा (ऊतकों में सूजन) या पैरों में सूजन जिसे ऐलीफेन्टाइसिस (त्वचा/ऊतकों का मोटा होना) कहा जाता है तथा जननांगों का हाइड्रोसील (भ्लकतवबवमसम) भी हो सकता है, मरीज के वृषणकोश (ैबतवजनउ) में सूजन तथा मूत्र का रंग दूधिया होना भी शामिल है। स्तनों एवं जननांगों का प्रभावित होना आम है। इन शारीरिक विकृतियों से सामाजिक तौर पर बदनामी (ेजपहउं) तथा आर्थिक कठिनाईयों का सामना करना पड़ता है। अलग-थलग पड़ जाने एवं गरीबी का सामाजिक-आर्थिक बोझ भी बहुत अधिक हो जाता है।

इस रोग से व्यक्ति के शारीरिक , सामाजिक व मानसिक विकास पर प्रभाव पड़ता है जिसके कारणवश संपूर्ण विकास नहीं हो पाता है।
- विश्व स्वास्थ्य संगठन (ॅभ्व्) के अनुसार विश्व में फाइलेरिया लंबी अवधि की विकलांगता के सबसे आम कारणों में दूसरे स्थान पर है; सबसे पहला कारण- मानसिक रोग है।
- हालांकि फाइलेरिया जानलेवा नहीं है, किंतु इससे होने वाली अपंगता के कारण व्यक्ति की कमाने की क्षमता पर बुरा असर होता है तथा वह और ज्यादा गरीब होता चला जाता है।
- इस रोग से जो शारीरिक विकृति आती है उसकी वजह से मरीज समाज से अलग-थलग पड़ जाता है, नतीजतन उसका इलाज नहीं हो पाता।

लिम्फाटिक फिलारियासिस की बीमारी का बोझ

भारत पर इस बीमारी के वैश्विक बोझ का 39 प्रतिशत भार है। अनुमान है कि भारत में करीबन 3.1 करोड़ लोग लिम्फाटिक फिलारियासिस से संक्रमित हैं और 2.3 करोड़ से ज्यादा इसकी वजह से होने वाले अपंगता से जूझ रहे हैं।
भारत में यह रोग 21 राज्यों एवं केन्द्र शाषित प्रदेशों के 256 जिलों में फैला हुआ है। इस रोग के नए मुकामी जिलों की पहचान हेतु स्वास्थ्य मंत्रालय पुनः समीक्षा कर रहा है।

राष्ट्रीय वेक्टर जनित रोग नियंत्रण कार्यक्रम के आंकड़ों के मुताबिक बिहार में इस रोग का सबसे ज्यादा फैलाव है (17 प्रतिशत से अधिक), इसके बाद केरल (15.7 प्रतिशत ) और उत्तर प्रदेश (14.6 प्रतिशत) का नंबर आता है। आंध्र प्रदेश व तमिलनाडु का आंकड़ा 10 प्रतिशत है। सबसे कम प्रभावित राज्यों में सबसे पहले गोवा है (1 प्रतिशत से कम) इसके बाद लक्षद्वीप (1.8 प्रतिशत), मध्य प्रदेश (3 प्रतिशत से ज्यादा) और असम (लगभग 5 प्रतिशत) का नंबर आता है। ब्रुगिया मलयी कृमि का प्रसार केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश , ओडिशा, मध्य प्रदेश , असम व पश्चिम बंगाल में है।

राष्ट्रीय फाइलेरिया नियंत्रण कार्यक्रम

भारत में राष्ट्रीय फाइलेरिया नियंत्रण कार्यक्रम के अंतर्गत स्वास्थ्य कर्मी ’मास ड्रग ऐडमिनिस्ट्रेश न’ (एमडीए) नामक रणनीति के द्वारा उन आबादियों को ऐल्बनडाज़ोल और डायथाइलकार्बामज़ाइन (डीईसी) दवाएं देते हैं जो संक्रमण के जोखिम में हैं। भारत एमडीए की इस रणनीति पर चलते हुए 2004 से वर्ष में एक बार निर्दिष्ट जिलों में इस कार्यक्रम पर अमल करता आ रहा है। लिम्फाटिक फाइलेरिया संक्रमण के नियंत्रण हेतु किए जा रहे कार्यक्रम के लिए भारत का प्रयास सराहनीय है।

पिछले कुछ वर्षों में इस उपचार से संक्रमण व रोग से संक्रमित मामलों की तादाद में ठोस कमी आई है। लेकिन इस बीमारी को जड़ से खत्म करने के लिए अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। इस रोग से अपंग हुए लोगों के लिए घर आधारित तरीकों से अपंगता प्रबंधन किया जाता है और ज्यादा गंभीर मामलों में सर्जिकल आॅपरेशन किया जाता है।

लिम्फाटिक फाइलेरिया के पूर्ण रोकथाम एवं नियंत्रण हेतु लक्ष्य हासिल करने में भारत के प्रयास इस क्षेत्र के लिए बहुत अहम हैं। भारत को 2020 तक इस रोग को जड़ से मिटाने के लिए तैयार होने की जरूरत है तथा वर्तमान कार्यक्रम में अमल संबंधी जो खामियां हैं उन्हें दुरुस्त करने पर जोर देना होगा।

लिम्फाटिक फाइलेरिया के लिए मास ड्रग ऐडमिनिस्ट्रे (एमडीए)

कई जिले ऐसे हैं जो एमडीए के कई दौर के बावजूद इस रोग की रोकथाम एवं नियंत्रण नहीं कर पाए हैं। इसके कई कारणों में से प्रमुख है रोग के बारे में गलत जानकारी का प्रचलित होना तथा एमडीए के उद्देश्य व फायदों की जानकारी का अभाव।

लिम्फाटिक फाइलेरिया के पूर्ण रोकथाम एवं नियंत्रण हेतु एक बड़ी चुनौती यह है कि चूंकि दो-तिहाई संक्रमित आबादी के लक्षण प्रकट नहीं होते तो वे यह समझ नहीं पाते कि उन्हें इलाज की जरूरत क्यों है।
जागरुकता उत्पन्न करने, समुदाय को संवेदनशील बनाने और उन्हें एकजुट कर आगे लाने की कोशिशें तथा समुदायों एवं सामुदायिक स्वास्थ्य स्वयंसेवकों का शामिल होना महत्वपूर्ण है तभी उपचार का अनुपालन सुनिश्चित किया जा सकेगा तथा सभी बाकी बचे मुकामी जिलों में एमडीए के जरिए कवरेज हो पाएगी।

उत्तर प्रदेश में 20 जिले अभी भी लिम्फाटिक फाइलेरिया के मुकामी जिले हैं जिनमें शामिल हैंः फतेहपुर, जौनपुर, सोनभद्र, वाराणसी, पीलीभीत, लखनऊ, उन्नाव, हरदोई, खेड़ी, रायबरेली, औरैया, फर्रुखाबाद, कन्नौज, कानपुर (देहात), कानपुर (नगर), मिर्जापुर, सीतापुर, अमेठी, सुल्तानपुर और गाजीपुर। इन जिलों में 18-20 दिसंबर को एमडीए का दौर होगा।

लिम्फाटिक फिलारियासिस के उन्मूलन के लिए रणनीतियों व रोग प्रबंधन के सभी स्तरों पर स्वास्थ्य कर्मियों का असरदार तरीके से शामिल करने की जरूरत है। ग्राम स्तर पर आशा से लेकर प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा स्तर पर तथा उपचार के अन्य स्तरों पर स्वास्थ्य कर्मियों तक सब को साथ लेना होगा।

कामयाबी के लिए निरीक्षण व निगरानी के साथ प्रभावी कार्यक्रम प्रबंधन महत्वपूर्ण है ताकि सफलता को न केवल प्राप्त किया जाए बल्कि उसे बरकरार भी रखा जा सके।


महबूब अली बने लोक लेखा समिति के अध्यक्ष

महबूब अली बने लोक लेखा समिति के अध्यक्ष

महबूब अली बने लोक लेखा समिति के अध्यक्ष

अधिकारी फील्ड में जाएं और काम करें -श्रीकान्त शर्मा

अधिकारी फील्ड में जाएं और काम करें -श्रीकान्त...

अधिकारी फील्ड में जाएं और काम करें -श्रीकान्त शर्मा

मदरसों का होना चाहिए आधुनिकीकरण-योगी

मदरसों का होना चाहिए आधुनिकीकरण-योगी

मदरसों का होना चाहिए आधुनिकीकरण-योगी

लखनऊ के ब्राइटलैंड स्कूल में घटी घटना के बाद छात्र से मिलने पहुंचे CM योगी

लखनऊ के ब्राइटलैंड स्कूल में घटी घटना के...

लखनऊ के ब्राइटलैंड स्कूल में घटी घटना के बाद छात्र...

योगी सरकार का एहम फैसला - शहरों के अंदर बूचड़खाने पर पूरी तरह से पाबंदी

योगी सरकार का एहम फैसला - शहरों के अंदर बूचड़खाने...

योगी सरकार का एहम फैसला - शहरों के अंदर बूचड़खाने...

रोक लगने पर भी धार्मिक व सार्वजनिक जगहों पर लाउडस्पीकर इस्तेमाल करने वालों को नोटिस

रोक लगने पर भी धार्मिक व सार्वजनिक जगहों...

रोक लगने पर भी धार्मिक व सार्वजनिक जगहों पर लाउडस्पीकर...

ExpressNews7