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राजेन्द्र चौधरी ने कहा है कि भाजपा के पास अपनी कोई मौलिक सोच नहीं

राजेन्द्र चौधरी ने कहा है कि भाजपा के पास अपनी कोई मौलिक सोच नहीं

2018-05-14 17:28:29
राजेन्द्र चौधरी ने कहा है कि भाजपा के पास अपनी कोई मौलिक सोच नहीं

Lucknow--समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय सचिव राजेन्द्र चौधरी ने कहा है कि भाजपा के पास अपनी कोई मौलिक सोच नहीं होने से उसे दूसरों से या तो विचार उधार लेने पड़ रहे हैं या फिर दूसरों की योजनाओं पर अपना ठप्पा लगाना पड़ता है। इसमें भी उसका बचकानापन छलक जाता है। भाजपा ने सरदार पटेल और डाॅ0 बाबा साहब भीमराव अम्बेडकर को इधर अपने से जोड़ने के लिए हर हथकंडा अपनाया। आजादी के पहले और आजादी के बाद भी महात्मा गांधी को हिकारत की निगाह से देखने वाले भाजपा नेता अब उनके नाम के साथ उनके विचारों से भी घालमेल करने लगे हैं। छल छद्म की उनकी यह आदत पुरानी है।
       गांधी जी ग्राम स्वराज के प्रवर्तक थे। उनका सपना था गांव स्वावलम्बी हो, स्वच्छ हों और शिक्षा, रोजगार के साधन वहीं उपलबध हों। वे कृषि अर्थव्यवस्था के हामी थे। जबकि भाजपा मूलतः कारपोरेट व्यवस्था की पक्षधर है। भाजपा ने गांधी जी के विचारों को तो अपनाया नहीं जनता को भरमाने के लिए उनके ग्राम स्वराज को अपने अभियान से जरूर जोड़ने का छलावा हैं। गांधी जी की स्वच्छता की जगह भाजपा ने सिर्फ उनका चश्मा अपना लिया है। भाजपा का ग्राम स्वराज्य दिखावटी, ऊबाऊ और जनता का ध्यान भटकाने के लिए है।
        भाजपा ने गांधी जी के ग्राम स्वराज को अपने अभियान से बदनाम करने का काम किया है। दिखावे के लिए भाजपा नेताओं ने गांवों में गांधी जी का नाम लेकर तथाकथित चैपाल लगाई और रात्रि विश्राम को अपनी शाही आरामगाह में बदल डाला। कुछ मंत्रियों को रात में मच्छरों के काटने का कष्ट रहे। कुछ रात में चुपके से अपने बंगले पर सोने को चले गए और कइयों ने तो साफ-साफ कह दिया कि इस दिखावे से कुछ होने वाला नहीं है। भाजपा मंत्रियों का दलितों के यहां भोज में होटल के खाने का भी खूब मखौल उड़ा।
         भाजपाइयों का ग्राम स्वराज अभियान गांधी जी के प्रति असम्मान प्रदर्शित करता है। गांधी जी गांवों में पैदल जाते थे, उनकी समस्याएं देखकर न तो कोरे आश्वासन देते थे और नहीं उनके हालात का मजाक उड़ाते थे। जब गांधी जी ने गरीब महिलाओं को एक ही कपड़े में देखा तो उन्होंने स्वयं भी लंगोटी लगा ली थी। गांधी जी ने अपने आश्रमों में श्रम और समानता का नियम रखा था। गांधी जी के इसी ग्राम स्वराज के विचार को डाॅ0 राममनोहर लोहिया ने चैखम्भा राज का रूप दिया था। भाजपाई बताएंगे कि उन्होंने गांवों की दुर्दशा देखने के बाद कौन सा त्याग का संकल्प लिया है?
          दरअसल, भाजपा का ग्राम स्वराज अभियान सिर्फ चुनावी नाटकबाजी है। उसके इस अभियान में कोई गंभीरता नहीं है। यह तो जनता को भ्रमित करने और गांव के भोले भाले लोगों को बहकाने का एक तरीका भर है। अखिलेश यादव सही कहते हैं कि भाजपाई अपनी जेब में ‘ओपियम‘ की पुड़िया रखते हैं। भाजपा को न तो गांव से कोई मतलब है न ग्रामीणों से। वह इनको अपने ‘वोट बैंक‘ से ज्यादा महत्व नहीं देती है। भाजपा का हर काम छलकपट से शुरू और


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