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49 दिन तक चलने वाले कुम्भ की हुई शुरूआत,पहले शाही स्नान के दिन करोडो ने लगाई डुबकी

49 दिन तक चलने वाले कुम्भ की हुई शुरूआत,पहले शाही स्नान के दिन करोडो ने लगाई डुबकी

2019-01-15 07:09:14
49 दिन तक चलने वाले कुम्भ की हुई शुरूआत,पहले शाही स्नान के दिन करोडो ने लगाई डुबकी

49 दिन तक चलने वाले इस कुंभ मेले मे 12 करोड़ लोग आ सकते हैं
आठ शाही स्नान जनवरी 15 और 21 फरवरी 4,10,19 और मार्च मे 4 को होगा

प्रयागराज-दुनिया का सबसे बड़ा आयोजन कहे जाने वाले कुंभ मेले का पहला शाही स्नान शुरू हो चुका है. 49 दिन तक चलने वाले इस मेले का समापन चार मार्च को होगा और इस बीच आठ मुख्य पर्वों पर शाही स्नान होगा. शहर की ओर आने वाले सभी रास्तों पर बैरिकेडिंग की गई है और वाहनों को शहर के बाहर बने पार्किंग स्थलों पर ही रोक दिया जा रहा है. इन पार्किंग स्थलों से मेला क्षेत्र तक आने के लिए शटल बसें और ई-रिक्शा चलाए गए हैं. माना जा रहा है कि आज पहले शाही स्नान के दिन लगभग डेढ करोड़ लोग कुम्भ मे स्नान करेगे। 49 दिनों तक चलने वाले इस बार के कुंभ मेले में क़रीब 12 करोड़ लोगों के आने की संभावना है जिसमें 10 लाख के क़रीब विदेशी नागरिक भी होंगे.
कुंभ मेला दुनिया भर में होने वाले धार्मिक आयोजनों में श्रद्धालुओं की संख्या के लिहाज से सबसे बड़ा होता है. कुंभ का पर्व हर 12 साल के अंतराल पर किसी एक पवित्र नदी के तट पर मनाया जाता है. हरिद्वार में गंगा, उज्जैन में शिप्रा, नासिक में गोदावरी और इलाहाबाद में त्रिवेणी गंगा, यमुना और सरस्वती संगम पर कुंभ मनाया जाता है.ज्योतिष के मुताबिक, जब बृहस्पति कुंभ राशि में और सूर्य मेष राशि में प्रवेश करता है, तब कुंभ मेले का आयोजन किया जाता है. कुंभ का अर्थ है- कलश, ज्योतिष शास्त्र में कुम्भ राशि का भी यही चिह्न है. कुंभ मेले की पौराणिक मान्यता अमृत मंथन से जुड़ी हुई है.

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माना जाता है कि देवताओं और राक्षसों ने समुद्र के मंथन से प्रकट होने वाले सभी रत्नों को आपस में बांटने का निर्णय किया. समुद्र के मंथन द्वारा सबसे मूल्यवान रत्न अमृत निकला था जिसे पाने के लिए देवताओं और राक्षसों के बीच संघर्ष हुआ.इस दौरान अमृत की कुछ बूंदें छलक कर इलाहाबाद, नासिक, हरिद्वार और उज्जैन में गिरीं, तब से प्रत्येक 12 सालों के अंतराल पर इन स्थानों पर कुंभ मेला आयोजित किया जाता है. 12 साल के मतलब का देवताओं का बारह दिन होता है.
कुंभ मेले का आयोजन हजारों साल पहले से हो रहा है. मेले का प्रथम लिखित प्रमाण महान बौद्ध तीर्थयात्री हेवनेसांग के लेख में मिलता है. छठवीं शताब्दी में सम्राट हर्षवर्धन के शासन में होने वाले कुंभ का इन लेखों में वर्णन किया गया है.

 

 



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